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परलोक: जीवन मृत्यु के पश्चात
   

प्रश्न : परलोक अर्थात् मृत्यु के पश्चात जीवन को किस प्रकार सिद्ध किया जा सकता है?
उत्तर :

1. परलोक पर विश्वास अंधविश्वास का परिणाम नहीं है
कुछ लोग इस बात पर आश्चर्य करते हैं कि एक ऐसा व्यक्ति जिसकी सोच वैज्ञानिक और तार्किक हो वह परलोकवाद को किस तरह स्वीकार कर सकता है। लोग समझते हैं कि परलोकवाद में विश्वास करने वाले अंधविश्वास से ग्रस्त होते हैं। वास्तविकता यह है कि परलोक की धारणा एक तर्कसंगत धारणा है।
2. परलोक की धारणा के तार्किक आधार
पवित्र क़ुरआन में एक हज़ार से अधिक ऐसी आयतें हैं जिनमें वैज्ञानिक तथ्यों को बयान किया गया है। (देखिये पुस्तक Quran and Modern Science Compatible or Incompatible)
इन तथ्यों में वे तथ्य भी शामिल हैं जिनका पता पिछले कुछ शताब्दियों में चला है बल्कि वास्तविकता यह है कि विज्ञान अब तक इस स्तर तक नहीं पहुँच सका है कि वह कु़रआन की हर बात को सिद्ध कर सके।
मान लीजिए कि पवित्र कु़रआन में उल्लिखित तथ्यों का 80 प्रतिशत भाग विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरता है तो बाक़ी 20 प्रतिशत के बारे में भी यह कहना सही होगा कि विज्ञान उनके संबंध में कोई निर्णायक बात कहने में असमर्थ है। क्योंकि वह अभी अपनी उन्नति के उस स्तर तक नहीं पहुँचा है कि वह पवित्र क़ुरआन के बयानों की पुष्टि या उनका इंकार कर सके। हम अपनी सीमित जानकारियों के आधार पर विश्वास के साथ नहीं कह सकते कि क़ुरआन के बयानों का एक प्रतिशत अंश भी ग़लत और ग़लती पर आधारित है। देखने की बात यह है कि कु़रआन के सम्पूर्ण बयानों का अगर 80 प्रतिशत वास्तविक रूप से सही सिद्ध होता है तो तार्किक तौर पर शेष 20 प्रतिशत के बारे में भी यही निर्णय किया जाएगा। इस्लाम में परलोक या मृत्यु के पश्चात जीवन की कल्पना इसी 20 प्रतिशत हिस्से से संबंधित है जिसके बारे में बुद्धि और तर्क की माँग है कि उसे सही और त्रुटिहीन स्वीकार किया जाए।
3. परलोक की धारणा के बिना शान्ति तथा मानवीय मूल्यों की कल्पना व्यर्थ है
डकैती या लूटमार को एक आम सरल स्वभाव वाला व्यक्ति एक बुरी चीज़ समझेगा। फिर भी इसके विपरीत तर्क भी पेश किए जा सकते हैं, जैसे :
(क) जिस व्यक्ति को लूटा जाता है वह कठिनाई में पड़ जाता है
कोई कह सकता है कि जिस आदमी को लूटा जाता है वह बड़ी मुसीबतों का शिकार हो जाता है। मैं भी इस बात से सहमत हूँ कि जिसे लूटा जाता है उसके लिए यह बुरा है। लेकिन मेरे लिए यह अच्छा है। अगर मैं एक लाख रुपए लूटमार करके हासिल कर लूँ तो अपने लिए काफ़ी सुख-सुविधाएँ जुटा सकता हूँ।
(ख) कुछ लोग आपको भी लूट सकते हैं
कुछ लोग यह तर्क दे सकते हैं कि आपके साथ भी ऐसा हो सकता है कि आप लूट लिए जाएँ। लेकिन इसके जवाब में मैं यह कह सकता हूँ कि मेरे साथ ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि मैं एक अत्यन्त शक्तिशाली अपराधी हूँ और अपने साथ बहुत सारे बॉडीगार्ड रखता हूँ। इसलिए मैं तो किसी को भी लूट सकता हूँ लेकिन कोई दूसरा मुझे नहीं लूट सकता। लूटमार करना एक आम आदमी के लिए तो ख़तरनाक हो सकता है लेकिन एक प्रभावशाली व्यक्ति के लिए नहीं।
(ग) पुलिस आपको गिरफ़्तार कर सकती है
कुछ लोग कह सकते हैं कि अगर आप लूटमार करते हैं तो पुलिस आपको गिरफ़्तार कर सकती है। इसका जवाब मैं यह दे सकता हूँ कि पुलिस मुझे इसलिए गिरफ़्तार नहीं कर सकती कि पुलिस मेरे प्रभाव में है। इसी तरह कई मंत्री भी मेरे प्रभाव में हैं। मैं यह बात मानता हूँ कि अगर एक आम आदमी डकैती या लूटमार करता है तो वह गिरफ़्तार हो सकता है और यह बात उसके लिए बुरी हो सकती है लेकिन किसी असाधारण शक्ति और पहुँच रखने वाले अपराधी का पुलिस कुछ नहीं बिगाड़ सकती।
(घ) लूटमार की कमाई बेमेहनत की कमाई है
कुछ लोग कह सकते हैं कि यह आसानी के साथ प्राप्त की हुई कमाई है। मेहनत की कमाई नहीं है। मैं इस बात से पूर्ण रूप से सहमत हूँ कि यह आसानी की कमाई है। यही कारण है कि मैं लूटमार करता हूँ। अगर एक बुद्धिमान व्यक्ति के सामने दो विकल्प हों यानी वह आसानी के साथ भी दौलत कमा सकता है और परिश्रम के साथ भी तो निःसंदेह वह आसानी को पसन्द करेगा।
(ङ) लूटमार करना मानवता के विरुद्ध है
कुछ लोग कह सकते हैं कि लूटमार करना मानवता के विरुद्ध है और एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के हितों का ख़्याल रखना चाहिए। मैं इस तर्क का यह कहकर जवाब दे सकता हूँ कि आखि़र मानवता नाम का यह नियम किसने बनाया है और मैं क्यों इसका पालन करूँ। यह नियम भावुक लोगों के लिए तो अच्छा हो सकता है लेकिन चूँकि मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जो तर्क में विश्वास करता है, इसलिए मुझे दूसरों के हितों का ख़याल रखने में कोई लाभ नज़र नहीं आता।
(च) लूटमार करना एक स्वार्थपूर्ण कार्य है
कुछ लोग कह सकते हैं कि यह एक स्वार्थपूर्ण कार्य है। यह बात सत्य है कि लूटमार करना एक स्वार्थपूर्ण कार्य है, लेकिन मैं स्वार्थी क्यों न बनूँ? इससे मुझे आनन्दपूर्ण जीवन गुज़ारने में मदद मिलती है।
(i) लूटमार के बुरा होने का कोई तार्किक कारण नहीं है
वे सभी तर्क जो इस बात को साबित करने के लिए दिए जा सकते हैं कि लूटमार एक बुरा काम है, इस प्रकार उपरोक्त स्पष्टीकरण की रौशनी में व्यर्थ सिद्ध होते हैं।
यह प्रमाण और तर्क आम लोगों को तो संतुष्ट कर सकते हैं लेकिन किसी शक्तिशाली और प्रभावशाली अपराधी को नहीं।
इनमें से किसी भी प्रमाण को तार्किक आधारों पर तस्लीम नहीं किया जा सकता। इसलिए इसमें आश्चर्य की भी कोई बात नहीं है कि इस दुनिया में अपराधी लोग भरे पड़े हैं।
इसी प्रकार धोखा-धड़ी और बलात्कार आदि अन्य बुराइयों का मामला है। किसी भी प्रभावशाली और शक्तिशाली अपराधी को किसी भी तार्किक प्रमाण के साथ इन चीज़ों के बुरा होने के बारे में संतुष्ट नहीं किया जा सकता।
(ii) एक मुस्लिम किसी प्रभावशाली और शक्तिशाली अपराधी को संतुष्ट कर सकता है
अब हम इस समस्या पर एक दूसरे रुख़ से वार्ता करते हैं। मान लीजिए कि आप दुनिया के एक अत्यन्त प्रभावशाली व शक्तिशाली अपराधी हैं। आपके प्रभाव में पुलिस व मंत्री सभी हैं तथा आपके पास आपकी सुरक्षा के लिए फ़ौज भी है। आपको एक मुस्लिम क़ायल कर सकता है कि लूटमार करना, धोखा-धड़ी करना, बलात्कार और कुकर्म करना ये सारी चीज़ें ग़लत और बुरे कर्म हैं।
(iii) प्रत्येक व्यक्ति न्याय चाहता है
प्रत्येक व्यक्ति न्याय चाहता है। अगर वह दूसरों के लिए न्याय का इच्छुक न भी हो फिर भी वह अपने लिए तो अवश्य ही न्याय की अभिलाषा करता है। कुछ लोग ताक़त और प्रभाव के नशे में चूर होते हैं और दूसरों को दुख और तकलीफ़ पहुँचाते हैं। अगर ऐसे लोगों के साथ कोई अन्याय होता है तो उन्हें इसपर शिकायत होती है। ऐसे लोग जो दूसरों के दुख-दर्द को महसूस नहीं करते वास्तव में ताक़त और प्रभाव के पुजारी होते हैं।
(iv) ख़ुदा सबसे ज़्यादा शक्तिशाली और न्यायी है
एक मुस्लिम की हैसियत से एक व्यक्ति किसी अपराधी को उस ख़ुदा के अस्तित्व के बारे में क़ायल कर सकता है, जो किसी भी अपराधी से ज़्यादा शक्तिशाली है और हरेक के साथ न्याय करने वाला भी। पवित्र क़ुरआन में है—
‘‘ख़ुदा कभी कण-भर भी अन्याय नहीं करता।’’ (क़ुरआन, 4:40)
(v) ख़ुदा सज़ा क्यों नहीं देता?
एक ऐसा अपराधी व्यक्ति जो बुद्धि और विज्ञान में विश्वास रखता है और क़ुरआन के वैज्ञानिक तथ्यों को देखने के बाद इस बात से सहमत है कि ख़ुदा मौजूद है यह तर्क दे सकता है कि ख़ुदा शक्तिशाली और न्यायी होने के बावजूद उसे अपराधों पर सज़ा क्यों नहीं देता।
(vi) जो लोग किसी के साथ अन्याय करते हैं उन्हें सज़ा दी जाएगी
हर वह व्यक्ति जिसके साथ अन्याय हुआ हो यह देखे बग़ैर कि उसकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति क्या है, चाहता है कि अत्याचारी को सज़ा दी जाए। एक आम और सामान्य व्यक्ति चाहता है कि डकैत या बलात्कारी को शिक्षाप्रद सज़ा दी जाए। हालाँकि कुछ अपराधियों को सज़ा हो जाती है फिर भी बहुत-से अपराधी क़ानून की पकड़ से बच निकलने में सफल हो जाते हैं। वे भोग-विलास से पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं और आराम और चैन से रहते हैं। अगर ऐसे लोगों के साथ कोई ऐसा व्यक्ति अत्याचार करता है जो उनसे ज़्यादा शक्तिशाली और प्रभावशाली होता है तो फिर यही लोग इस बात के इच्छुक भी होते हैं कि उस अत्याचारी को सज़ा दी जाए।
(vii) यह जीवन परलोक के लिए आज़माइश है
यह दुनिया परलोक के लिए परीक्षा स्थल है। पवित्र क़ुरआन में है—
‘‘जिसने मौत और जि़न्दगी को पैदा किया ताकि तुम लोगों को आज़मा कर देखे कि तुममें से कौन अच्छे से अच्छा कर्म करने वाला है और वह प्रभुत्वशाली भी है और क्षमा करने वाला भी।’’ (क़ुरआन, 67:2)
(viii) फै़सले के दिन पूर्ण न्याय किया जाएगा
पवित्र क़ुरआन में है—
‘‘हर जान को मौत का मज़ा चखना है और तुम सब अपने कर्मों का पूरा बदला प्रलय के दिन पाने वाले हो, सफल वास्तव में वह है जो वहाँ नरक की आग से बच जाए और स्वर्ग में दाखिल कर दिया जाए। रहा यह संसार तो यह केवल एक ज़ाहिरी धोखे की चीज़ है।’’ (क़ुरआन, 3:185)
इंसान के साथ आख़िरी और पूर्ण न्याय का मामला परलोक में ‘‘बदले के दिन’’ होगा। सारे इंसानों को परलोक में हिसाब के दिन उठाया और ज़िन्दा किया जाएगा। यह संभव है कि किसी व्यक्ति की उसके किए कि सज़ा का एक भाग इस दुनिया में ही मिल जाए, लेकिन फाइनल सज़ा या इनाम उसे आख़िरत में दिया जाएगा। महान ख़ुदा एक डकैत या बलात्कारी को चाहे इस दुनिया में सज़ा न दे लेकिन परलोक में फै़सले के दिन वह ज़रूर अपराधी को सज़ा देगा।
(ix) इंसानी क़ानून हिटलर को भला क्या सज़ा दे सकता है?
हिटलर ने लगभग 60 लाख यहूदियों को मौत के घाट उतारा। पुलिस अगर उसे गिरफ़्तार कर लेती तो इंसानी क़ानून उसे क्या सज़ा दे पाता? ज़्यादा से ज़्यादा जो सज़ा ऐसे व्यक्ति को मिल सकती थी वह यह है कि उसे भी गैस चेम्बर में डाल दिया जाता। लेकिन देखा जाए तो यह सिर्फ़ एक यहूदी के क़त्ल की सज़ा होगी, लेकिन बाक़ी 59 लाख 99 हज़ार 999 को जलाकर मार डालने की सज़ा हिटलर को, क्या दी जा सकती थी?
(x) ख़ुदा हिटलर को 60 लाख से ज़्यादा बार नरक में जला सकता है
पवित्र क़ुरआन में है—
‘‘जिन लोगों ने हमारी आयतों का इंकार किया उन्हें हम जल्द ही आग में झोकेंगे। जब भी उनकी खालें पक जाएँगी तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल दिया करेंगे। ताकि वे यातना का मज़ा चख़ते ही रहें। निस्संदेह ख़ुदा प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।’’ (क़ुरआन, 4:56)
अगर ख़ुदा चाहे तो वह हिटलर को नरक में 60 लाख से ज़्यादा बार जला सकता है।
(xi) परलोक की धारणा के बिना मानवीय मूल्यों और भलाई-बुराई की कोई यथार्थता नहीं
यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि परलोक की धारणा के बग़ैर आप किसी अत्याचारी के सामने भलाई-बुराई और मानवीय मूल्यों की वास्तविकता और महत्व को सिद्ध नहीं कर सकते। विशेष रूप से ऐसे व्यक्ति के सामने जो अत्याचारी, दमनकारी, उद्दण्ड, सरकश और शक्तिशाली हो।

 


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