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गवाहों के बीच बराबरी का मामला
   

प्रश्न : दो औरतें गवाही में एक पुरुष के बराबर क्यों हैं?
उत्तर :
यह बात सही नहीं है कि हमेशा दो औरतों की गवाही एक पुरुष ही के बराबर होती है। यह केवल कुछ मामलों में है। क़ुरआन में कम से कम पाँच ऐसी आयतें हैं जिनमें गवाहों की गवाही का उल्लेख है। लेकिन उनमें औरतों और पुरुषों में अन्तर की बात नहीं कही गई है। क़ुरआन की सूरा बक़रा अध्याय 2 की आयत 282 जो क़ुरआन की सबसे बड़ी आयत है, उसमें माल और लेन-देन संबंधी आदेश दिए गए हैं। उस आयत का अनुवाद यह है—
‘‘ऐ ईमान लाने वालो! जब किसी निश्चित अवधि के लिए आपस में क़र्ज़ का लेन-देन करो तो उसे लिख लिया करो......और अपने पुरुषों में से दो गवाहों को गवाह बना लो, यदि दो पुरुष न हों तो एक पुरुष और दो स्त्रियाँ जिन्हें तुम गवाह के लिए पसंद करो गवाह हो जाएँ ताकि एक कन्फ्यूज़ हो जाए तो दूसरी उसे याद दिला दे।’’ (क़ुरआन, 2:282)
यह आयत माल के लेन-देन और ख़रीदने-बेचने से संबंधित मामलों पर रहनुमाई करती है। इस प्रकार के मामलों में यह आदेश दिया जा रहा है कि लिखित रूप में दोनों पक्षों के बीच इस तरह का मुआहदा तय पाए और इसके लिए दो गवाह बनाए जाएँ। यह ज़्यादा अच्छा है कि वे दोनों पुरुष ही हों। अगर दो पुरुष न मिल सकें तो एक पुरुष और दो औरतें काफ़ी होंगी।
जैसे कि एक व्यक्ति किसी ख़ास बीमारी का ऑपरेशन कराना चाहता है तो सही तौर पर इलाज के बारे में जानने के लिए वह इस बात को प्राथमिकता देता है कि वह दो योग्य एवं मान्यता-प्राप्त डॉक्टरों की इस बारे में राय जाने। अगर उसे दो सर्जन नहीं मिल पाते तो एक सर्जन और दो जनरल डॉक्टरों से जो केवल MBBS हैं, सम्पर्क करता है। क्योंकि दूसरे विकल्प के तौर पर अब यही उसके बारे में बाक़ी रह जाता है।
इसी प्रकार माल संबंधी या कारोबारी लेन-देन में दो पुरुषों को प्राथमिकता दी जाती है। इस्लाम पुरुष को इस रूप में देखता है कि वह अपने घर वालों की आर्थिक ज़रूरत पूरी करने का जि़म्मेदार है। अब चूंकि आर्थिक ज़िम्मेदारी पुरुषों के सिर है इसी लिए उनसे यह आशा की जाती है कि वे औरतों के मुक़ाबले में कारोबारी मामलों के अन्दर ज़्यादा योग्यता, क़ाबलियत और तजुर्बे वाले होंगे। दूसरे विकल्प के तौर पर गवाह एक पुरुष और दो औरतें हो सकती हैं। इसकी वजह यह है कि अगर एक औरत कोई ग़लती करे तो दूसरी औरत उस ग़लती को ठीक कर सके। अरबी शब्द जो कु़रआन में प्रयुक्त हुआ है वह ‘तज़िल’ है जिसका अर्थ है मानसिक उलझन (Confusion) या ग़लती करना। कुछ लोगों ने इसका अनुवाद भूलना किया है जो ग़लत है। इस तरह माली या कारोबारी लेन-देन एक मात्र ऐसा मामला है जिसमें दो गवाह औरतें एक गवाह मर्द के बराबर बताई गई है।
कुछ इस्लामी विद्वान यह राय रखते हैं कि औरतों का व्यवहार क़त्ल के मामले की गवाही पर प्रभावित हो जाता है। इस तरह के मामलों में औरतें मर्दों के मुक़ाबले में अधिक भयभीत और आतंकित हो जाती हैं। अपनी इस भावुकता के कारण वे बहुत ज़्यादा मानसिक उलझन (Confusion) का शिकार हो सकती हैं। अतः कुछ धर्मशास्त्रियों की दृष्टि में क़त्ल के मामले में दो औरतों की गवाही एक पुरुष की गवाही के बराबर होती है। पवित्र कु़रआन में इस प्रकार की पाँच आयतें हैं जो गवाही के विषय पर प्रकाश डालती हैं। लेकिन उनमें से किसी में भी औरत और मर्द का उल्लेख नहीं है। मीरास के बँटवारे के काग़ज़ात बनाने में गवाह के तौर पर दो न्यायप्रिय व्यक्तियों की ज़रूरत पड़ती है। पवित्र क़ुरआन में कहा गया है—

‘‘ऐ ईमान लाने वालो! जब तुममें से किसी की मृत्यु का समय आ जाए तो वसीयत के समय तुममें से दो न्यायप्रिय व्यक्ति गवाह हों। या तुम्हारे ग़ैर लोगों में से दूसरे दो व्यक्ति गवाह बन जाएँ, यह उस समय कि यदि तुम सफ़र में गए हो और मौत तुम पर आ पहुँचे।’’ (क़ुरआन, 5:106)

औरत पर आरोप लगाने के मामले में न्याय के लिए चार व्यक्तियों की ज़रूरत होती है

‘औरत की इस्मत और अस्मिता को निशाना बनाने या उस पर आरोप धरने की सूरत में चार गवाहों की ज़रूरत पड़ती है।’ (क़ुरआन, 24:4)
कुछ इस्लामी विद्वान कहते हैं कि दो औरतों की गवाही एक मर्द की गवाही के बराबर होना सभी मामलों में लागू होती है। इस राय से किसी भी सूरत में सहमत नहीं हुआ जा सकता, क्योंकि पवित्र क़ुरआन की सूरा 24 नूर आयत 8 बहुत स्पष्ट तौर पर एक मर्द और एक औरत की गवाही को समान ठहराती है।

‘‘पत्नी से भी सज़ा को यह बात टाल सकती है कि वह चार बार अल्लाह की क़सम खाकर गवाही दे कि वह बिलकुल झूठा है।’’ (क़ुरआन, 24:8)

हज़रत आइशा (रजि़॰) की हदीस में भी एक गवाही की बात है
बहुत से धर्मशास्त्री इस बात पर एक मत हैं कि चाँद देखने के बारे में केवल एक औरत की गवाही काफ़ी है। विचार करें कि एक औरत की गवाही इस्लाम के एक अहम स्तंभ के लिए काफ़ी है। यानी तमाम मुस्लिम मर्द और औरतों का एक औरत की गवाही पर रोज़ा रखना। कुछ धर्मशास्त्रियों का कहना है कि रमज़ान के रोज़े के लिए एक औरत की गवाही काफ़ी होगी, जबकि उसके ख़त्म पर अर्थात् ईद के दिन दो गवाही की ज़रूरत होगी। इस सिलसिले में एक मर्द और औरत के बीच कोई अंतर नहीं होगा। कुछ हालतों में केवल औरत की ही गवाही की ज़रूरत होती है। मर्द की गवाही उस सिलसिले में क़बूल नहीं होगी, उदाहरणार्थ औरतों के विशेष मामलों में। जैसे कि औरत के शव को ग़ुस्ल देते वक़्त गवाह औरत ही हो सकती है।
कारोबारी और माल संबंधी मामलों में प्रकट रूप से जो असमानता पुरुषों और औरतों के बीच दिखाई देती है, उसकी वजह लैंगिक असमानता नहीं है। उसका कारण वास्तव में केवल यह है कि पुरुषों और औरतों की अपनी प्राकृतिक विशेषताएँ और समाज में विभिन्न भूमिकाएँ हैं, जिन्हें इस्लाम ने उनमें से प्रत्येक के लिए निश्चित किया है।

 


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