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बहुपत्नीत्व-नारी-जाति पर अत्याचार?
   

बहुपत्नीत्व-नारी-जाति पर अत्याचार?

इस्लाम में बहुपत्नीत्व का प्रचलन है जो नारी के शोषण तथा उसके प्रति दुर्व्यहार व अत्याचार है। विशेषतः भारत के परिप्रेक्ष्य में इसका एक मुख्य आयाम यह भी है कि मुसलमान कई-कई पत्नियां रखकर अधिक सन्तानोत्पत्ति करके अपनी जनसंख्या बढ़ा रहे हैं। इस प्रकार कुछ वर्षों में वे बहुसंख्यक समुदाय बनकर देश की सत्ता अपने हाथ में कर लेना चाहते हैं।
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ईश्वरीय धर्म मानव-इतिहासके विभिन्न चरणों में, विभिन्न भू-भागों की विभिन्न जातियों व क़ौमों के हाथों बार-बार विकरित व प्रदूषित होते-होते तथा बार-बार ईशदूतों के आगमन द्वारा सुधार प्रक्रिया जारी किए जाते-जाते, 1400 वर्ष पूर्व जब ‘इस्लाम’ के रूप में आया उस समय बहुपत्नीत्व (Polygyny) विभिन्न रूपों में विश्व को लगभग हर समाज, संस्कृति में प्रचलित था। उदाहरणतः स्वयं हिन्दू समाज की अत्यंत महत्वपूर्ण, महान आदर्णीय धार्मिक विभूतियों तथा महापुरुषों की कई-कई (सैकड़ों से हज़ारों तक) पत्नियों व रानियों का उल्लेख धर्म ग्रंथों में मौजूद था। अरब समाज में भी—जिसमें ईशग्रंथ क़ुरआन के अवतरण के साथ इस्लाम का पुनर्गमन हुआ—पत्नियों की अधिकतम संख्या निर्धारित व नियंत्रित न थी। इस्लाम ने ‘‘अधिकतम चार’’ की संख्या निर्धारित कर दी। इस प्रकार इस्लाम ने ‘बहुपत्नीत्व’ का प्रचलन आरंभ नहीं किया बल्कि ‘अधिकतम सीमा’ का निर्धारण व नियंत्रण किया।
बहुपत्नीत्व की इजाज़त
इस्लाम ने यह इजाज़त दी कि व्यक्तिगत, सामाजिक तथा नैतिक स्तर पर यदि ऐसी परिस्थिति का सामना हो कि बहुपत्नी-विवाह, पुरुष, स्त्री, परिवार तथा समाज के लिए लाभप्रद हो तो पुरुष परिस्थिति-अनुसार दो, तीन या अधिक से अधिक चार पत्नियां रख सकता है। यह इजाज़त इस शर्त के साथ (Conditional) है कि सभी पत्नियों के बीच पूर्ण न्याय व बराबरी का मामला किया जाए। अगर ऐसा न होने की आशंका हो या पुरुष में इसका सामर्थ्य न हो, तो शरीअत का आदेश है कि ‘बस एक ही’ पत्नी के साथ दाम्पत्य जीवन बिताया जाए।
मुस्लिम समाज में 1400 वर्षों से आज तक हर देश में—हमारे देश भारत में भी—इसी बात पर अमल होता रहा है। अगली पंक्तियों में यह देखने का प्रयास किया जा रहा है कि यद्यपि सामान्य परिस्थितियों में, मुस्लिम समाज सहित किसी भी समाज में बहुपत्नीत्व वस्तुतः प्रचलित नहीं है तो फिर वे कौन-सी विशेष (असामान्य) परिस्थितियां हैं जिनमें बहुपत्नीत्व की ज़रूरत पड़ जाती है? इसके फ़ायदे क्या हैं तथा इसे निषिद्ध कर देने की हानियां क्या हैं? इसे निषिद्ध और ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर देने तथा इसका रास्ता बन्द कर देने से पुरुष, स्त्री, संतान, परिवार, समाज और व्यवस्था पर क्या-क्या कुप्रभाव पड़ते हैं?
विभिन्न परिस्थितियां
परिस्थिति—1: पत्नी किसी कारणवश संतानोत्पत्ति की क्षमता नहीं रखती। वह बांझ हो सकती है या उसे कोई विशेष रोग हो सकता है। पति, पिता बनने और अपनी नस्ल आगे बढ़ाने की कामना का दमन करने में स्वयं को असमर्थ पाता है।
परिस्थिति—2: पत्नी किसी ऐसे यौन-रोग (Veneral Desease) से ग्रस्त हो जाए कि चिकित्सा-विशेषज्ञों द्वारा पति को उससे संभोग करने की मनाही कर दी जाए। पति स्वयं पर नियंत्रण रखने में असमर्थ है।
परिस्थिति—3: किसी विधवा स्त्री का कोई सहारा न हो। उसे मानसिक, भावनात्मक, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, नैतिक (चारित्रिक) तथा यौनवृत्ति (Sexual) स्तर पर अशांति, असुरक्षा, अपमान, उत्पीड़न व शोषण और असंतुष्टि आदि से जूझना पड़ रहा हो, या इसकी प्रबल आशंका हो। कोई भी कुंवारा व्यक्ति उससे विवाह करने को तैयार न हो (जो कि एक अकाट्य सामाजिक तथ्य है)। और मायके/ससुराल में उस विधवा का कोई सहारा न हो।
परिस्थिति—4: किसी विधवा के छोटे-छोटे बच्चे हों। इन मासूमों के ‘अनाथपन’ और अपने ‘विधवापन’ का दोहरा बोझ उठाना एक अबला के लिए कठिन, असह्य या अभिशाप बन जाए। न मायका, न ससुराल, न रिश्तेदार न समाज, कोई भी उसकी सहायता के लिए आगे न आ रहा हो।
परिस्थिति—5: किसी बड़े युद्ध, या महायुद्ध में पुरुष इतनी बड़ी संख्या में मारे जाएं कि अविवाहित या विधवा स्त्रियों की संख्या, जीवित/कुं$वारे पुरुषों से बहुत अधिक हो जाए।
परिस्थिति—6: पुरुष में यौन-शक्ति व कामवासना इतनी अधिक हो कि वह आत्म-संयम व आत्म-नियंत्रण में असमर्थ हो जाए; एक पत्नी से वह संतुष्ट न हो पा रहा हो तथा यह असंतुष्टि इतनी प्रबल हो जाए कि धार्मिक संवेदनशीलता, नैतिकता या सामाजिक परम्परा तथा सर्वमान्य आचारसंहिता पर भारी पड़ जाए।
देखना चाहिए कि उपरोक्त परिस्थितियों में ‘ग़ैर-इस्लाम’ (Non-Islam) और ‘इस्लाम’ के पास क्या-क्या विकल्प (Alternative) हैं। यह भी देखना चाहिए कि हर तत्संबंधित विकल्प स्त्री के प्रति अत्याचार व अभिशाप है या वरदान व सम्मान। साथ ही यह बात भी कि स्वयं पति, दाम्पत्य जीवन, परिवार और सामाजिक व्यवस्था के लिए कौन-सा विकल्प हानिकारक है और कौन-सा विकल्प लाभदायक।
ग़ैर-इस्लामी (Non-Islamic/Anti-Islamic) विकल्प
उपरोक्त परिस्थितियों में ग़ैर-इस्लामी विकल्प (एकपत्नीत्व, Monogyny) के प्रभाव व परिणाम निम्नलिखित हैं:
1. पति, पत्नी से, परिवार से, और क़ानून-व्यवस्था से छिपा कर दूसरा विवाह कर ले। दूसरे शब्दों में, वह सब को धोखा देता रहे, दूसरी पत्नी पर अपने समय और धन के ख़र्च को छिपाने के लिए पहली पत्नी तथा अन्य परिवारजनों से हमेशा झूठ बोलता रहे। इतने सारे बखेड़े पालने की क्षमता न हो तो बेचारी, बेक़सूर पहली पत्नी से ‘छुटकारा’ पाने का कोई अनैतिक या अपराधपूर्ण रास्ता इख़्तियार कर ले।

2. किसी स्थाई रोग-वश पत्नी से संभोग न किया जा सकता हो तो चोरी-छिपे पराई स्त्रियों से अनैतिक संबंध स्थापित किया जाता है। ऐसी स्त्रियों की संख्या कितनी भी हो सकती है। अनाचार व व्यभिचार की इस परिधि की कोई सीमा नहीं। कितनी स्त्रियों का शील भ्रष्ट होता है, कोई चिंता नहीं। कितने यौन-दुराचार होते हैं, ससहमति यौनाचार (Consensual sex) के तर्क पर क़ानून व प्रशासन की ओर से कोई पकड़ नहीं। मौजूद पत्नी का कितना अधिकार-हनन होता है, कोई फ़िक्र नहीं। पुरुष, पत्नी तो ‘एक’ ही रखे और रखैलें (Concubines) कई रखे, कोई हर्ज नहीं। नगर-नगर वैश्यालय खुले हुए हों जहां नारी-शील खरीदा-बेचा जा रहा हो, ठीक है। पति जहां चाहे मुंह मारे, समाज में जितनी चाहे गन्दगी फैलाए, जितनी भी युवतियों व नारियों के शील के साथ खिलवाड़ करे, सब ठीक है लेकिन वैध व जायज़ रूप में दूसरी पत्नी घर ले आए तो ‘नारी पर अत्याचार’ का दोषी व आरोपी ठहरे। या पहली (बेक़सूर) पत्नी से ‘किसी और’ विधि से, पहले छुटकारा पा ले, तभी दूसरा विवाह करे। यह छुटकारा तलाक़ द्वारा भी हो सकता है; और अदालती तलाक़ के लंबे बखेड़े में उलझना मुश्किल हो तो हत्या करके या हत्या कराके भी या रसोई में आग लग (लगा) कर भी।
3. पहले ‘सती’ का विकल्प था। अब क़ानून ने विधवा को इस ‘विकल्प’ से ‘वंचित’ कर दिया है लेकिन क़ानून विधवा को कोई बेहतर प्रभावकारी, ठोस विकल्प प्रदान करने से असमर्थ है अतः उसने यह काम परिवार तथा समाज के लिए छोड़ दिया है। मायके के परिवार में सामान्यतया विधवा (बेटी, बहन) की वापसी का परम्परा नहीं है। अगर व वापस गई भी तो चूड़ियां तोड़ कर, मांग सूनी करके, श्रृंगार से वंचित रहकर, सफ़ेद साड़ी पहनकर, अभागिन, अबला बनकर, ननदों व भावजों के ताने-कोसने सहकर, बेबसी, लाचारी की अवस्था में भाई-भावज की सेविका, दासी बनकर रहने के लिए। समाज न तो उसे दूसरा विवाह करने की अनुमति देता न किसी पुरुष को अनुमति देता है कि वह विवाहित रहते हुए उस दुखियारी को पत्नी बनाकर उसकी सारी समस्याओं का समाधान कर दे (और क़ानून भी उसे इसकी इजाज़त नहीं देता)। इसलिए समाज या तो उस विधवा को धक्के खाने और नाना प्रकार को शोषण व उत्पीड़न-अपमान झेलने के लिए छोड़ देगा; या कुछ दया आ ही गई तो किसी विधवाश्रम में डाल आएगा। यह अलग बात है कि कुछ विधवाश्रम बेचारी विधवाओं का सुनियोजित देहव्यापार भी करते हों।
4. लगभग वही विकल्प जो परिस्थिति 3 में व्यक्त किए गए। ज़्यादा से ज़्यादा, अनाथों को अनाथालयों के सुपुर्द कर देने का प्रावधान, जहां यदि नैतिकता या ईशपरायणता के गुण प्रबल व सक्रिय न हों तो अनाथों पर अत्याचार और उनका बहुआयामी शोषण। विधवा मां अलग, उसके कलेजे के टुकड़े अलग।
5. ‘परिस्थिति-5’ के अंतर्गत, इतिहास साक्षी है कि स्त्रियां और विधवाएं जन-सम्पत्ति (Public Property) बन जाने पर विवश हुईं। नारी-जाति के इस जघन्य यौन-शोषण के अतिरिक्त समाज और व्यवस्था के सामने कोई विकल्प न रहा।
6. ही विकल्प, जो 2 में उल्लिखित है।
इस्लामी विकल्प:
उपरोक्त परिस्थितियों में इस्लाम ने ‘बहुपत्नीत्व’ का विकल्प दिया। इसमें नारी के यौन-संरक्षण व सुरक्षा (Sexual Security) का निश्चित होना निहित है। फिर उसकी भावनात्मक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक (Psychological), शारीरिक, भौतिक, आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा को निश्चित किया गया है, यह उस पर इस्लाम का उपकार व एहसान है, इसे अत्याचार व शोषण और अपमान वही व्यक्ति कह सकता है जिसका विवेक मुर्दा हो चुका है। इससे आगे, बहुपत्नीत्व का यह इस्लामी प्रावधान स्वयं पति के शील, सज्जनता, सदाचरण तथा नैतिक अस्तित्व के लिए एक शुभ तंत्र है। विधवाओं की समस्या से लेकर अनाथों की समस्या तक, इससे स्वतः हल होती रहती है और समाज का नैतिक ताना-बाना बिखरने नहीं पाता।
किसी बड़े युद्ध या ‘महायुद्ध’ में जब लाखों लोग (अधिकतर पुरुष) मारे जाएं और लाखों स्त्रिायां विधवा हो जाएं तो ग़ैर-इस्लामी सभ्यता का इतिहास बताता है कि ऐसी स्त्रियों में से अधिकतर को जन-सम्पत्ति (Public Property) बनाकर रख देने के सिवाय, समाज व सामूहिक तंत्र के पास और कोई विकल्प नहीं रह जाता। इस्लाम ऐसी असाधारण/आपात परिस्थिति में बहुपत्नीत्व का विकल्प खुला रखकर बेसहारा विधवाओं को सामाजिक, आर्थिक, एवं मानसिक उत्पीड़न तथा यौन-शोषण से बचा लेता है।
बहुपत्नीत्व और जनसंख्या वृद्धि
किसी भी समाज की तरह मुस्लिम समाज की भी सामान्य व्यावहारिक व वास्तविक स्थिति इस बात का खंडन करती है कि ‘हर मुसलमान चार शादियां करता है’। इससे बड़ी मूर्खता की बात और क्या होगी कि, (1) मुस्लिम समाज में स्त्रियों की संख्या पुरुषों की संख्या से ‘चार गुना’ ज़्यादा है; और (2) हर व्यक्ति चार-चार पत्नियों की व्यक्तिगत आवश्यकताएं व मांगें तथा उनके भरण-पोषण की ज़िम्मेदारियां, सामान्यतः पूरी करने की अवस्था में रहता है।
यह बात भी एक ‘सफ़ेद झूठ’ है कि मुस्लिम व ग़ैर-मुस्लिम जनसंख्या-वृद्धि का अनुपात 4:1 है। जनसांख्यकी (Demography) के आंकड़े बताते हैं कि गत साठ वर्षों में मुस्लिम जनसंख्या देश की कुल जनसंख्या का 10-13 प्रतिशत रही है। उधर पिछले लगभग 30 वर्षों से कुछ ‘विशेष’ मानसिकता के तथाकथित ‘समाजशास्त्री’ बार-बार अपनी विशेष अंकगणित (Arithmatics) और बीजगणित (Algebra) द्वारा यह ‘तथ्य’ प्रस्तुत कर करके देशवासियों को भयभीत करते (और इसमें असफल होते) रहे हैं कि ‘बस अगले बीस-तीस वर्षों में ही मुस्लिम जनसंख्या, ग़ैर-मुस्लिमों के बराबर हो जाएगी और मुसलमान फिर से सत्ता हथिया लेंगे।’
कोई भी व्यक्ति जिसके पास थोड़ी-सी भी अक़्ल हो, यानी वह बिल्कुल पागल न हो, यह बात मानने के लिए तैयार न होगा कि यदि सौ पुरुष सौ स्त्रियों से 500 संतान पैदा करते हैं तो 25 पुरुष (100 स्त्रियों से शादी करके, अगर ऐसा होना मान भी लिया जाए तो) 500 संतान पैदा करेंगे। इसलिए ‘हम पांच हमारे पचीस’ का आक्षेप किसी सभ्य समाज के एक सभ्य समुदाय की बेइज़्ज़ती व चरित्रहनन की तुच्छ व घटिया हरकत ही कहा जाएगा। एक मुस्लिम पुरुष ने 4 पत्नियां रखी हों और उसके 4×5=20 बच्चे हों, ऐसी एक भी मिसाल पूरे देश में नहीं मिल सकती, यह तो बहुत दूर की, और हास्यास्पद बात है कि भारत के सारे मुसलमानों से 20-20 संतान होने की संभावना हो और इस असंभव कल्पना के आधार पर ‘आंकड़े’ गढ़े जाएं, देशवासियों को मूर्ख समझ कर उन्हें मुस्लिम बहुसंख्या से डराया जाए।
 


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