इस्लाम का इतिहास
नारी जगत
मानव-अधिकार
जिहाद
क़ुरआन की शिक्षाएं
पैग़म्बर की शिक्षाएं
इशूज़ (मुद्दे)
जीवन-व्यवस्था
ग़लत फ़हमियों का निवारण
अंधेरे से उजाले की ओर
परिप्रश्न
ग़ैर-मुस्लिम विद्वानों के विचार
अन्य वेबसाइट
आपका नाम
मित्र का नाम
मित्र का ईमेल
संदेश
‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’—पृथकतावाद?
   

‘मुस्लिम पर्सनल लॉ’—पृथकतावाद?

‘‘भारत के मुसलमान अपने लिए अलग पर्सनल लॉ होने पर आग्रह (ज़िद) क्यों करते हैं? इस  हठ से उनमें अलगाव की नीति का बोध होता है। सारे भारतवासियों के लिए ‘समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) होना चाहिए, यह देश की एकता व अखण्डता का भी तक़ाज़ा है और तमाम नागरिकों के, क़ानून की निगाह में बराबर होने का तक़ाज़ा भी। संविधान भी यही चाहता है।’’
●●●

इस संदेह, ग़लतफ़हमी और आपत्ति के तीन पहलू हैं :
1. भारतीय संविधान में ‘समान नागरिक संहिता’ की बात का उल्लिखित होना,
2. समान नागरिक संहिता लागू न होने का परिणाम, ‘देश की एकता, अखण्डता को ख़तरा’ होना, तथा
3. मुसलमानों की, अपने अलग पर्सनल लॉ के लिए ज़िद।
1. संविधान में समान नागरिक संहिता का उल्लेख
यह सही है कि संविधान में समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की बात कही गई है। लेकिन यह बात उसके प्रस्तावना (Preamble) में कही गई है, न कि मूल संविधान में। मूल संविधान में धाराओं 25(1) और 26(ठ) के अंतर्गत जो बातें कही गई है उनका सार यह है कि हर धार्मिक समुदाय को इसका अधिकार प्राप्त होगा कि अपने धर्म पर चले, तथा अपने तौर पर अपने धार्मिक क्रिया-कलाप अंजाम दे। अतः यह सिर्फ़ मुसलमानों (या अन्य अल्पसंख्यक समुदायों) का मआमला ही नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधान का भी तक़ाज़ा है कि उसके अंतर्गत देश में समान नागरिक संहिता लागू न हो।
2. देश की एकता, अखण्डता का प्रश्न
यदि अलग पर्सनल लॉ से देश की एकता, अखण्डता को ख़तरा है तो फिर मुसलमानों से ज़्यादा, उन प्रबुद्धजनों और भारत के शुभचिंतकों पर इस शंका या आरोप की छाया पड़ जाती है जिन्होंने ‘विश्व का उत्तम’ संविधान समझा जाने वाला संविधान बनाया और उसमें धाराओं 25(1) और 26(B) को उल्लिखित किया था।
यदि मुस्लिम समुदाय, फ़ौजदारी क़ानून (Criminal Code) की धाराओं को मानता है क्योंकि फ़ौजदारी के मामलों में दूसरा पक्ष ग़ैर-मुस्लिम भी हो सकता है; और दीवानी मआमलों में से व्यक्तिगत, घरेलू व पारिवारिक मामलों को छोड़कर (जिनमें दूसरा पक्ष ग़ैर-मुस्लिम नहीं हो सकता) अधिकतर में वह हर नागरिक पर लागू क़ानून पर ही अमल करता है तो सिर्फ़ कुछ थोड़े से दीवानी मआमलों (जैसे विवाह, तलाक़ आदि) में अलग क़ानून पर चलने से देश की एकता-अखण्डता का ख़तरे में पड़ जाना, समझ से बाहर, एक तर्करहित बात मानी जाएगी। 62 साल से तो ऐसा कोई ख़तरा आया नहीं, वरना अगर शंका या आरोप में सच्चाई होती तो अब तक वह ख़तरा कभी न कभी, थोड़ा बहुत ही सही, सामने आ जाता और देश के कुछ छोटे या बड़े टुकड़े जो जाना चाहिए थे; जबकि ये 62 वर्ष गवाह हैं कि भारतीय मुसलमानों ने भारत की उन्नति व प्रगति में किसी भी (बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक) समुदाय से कम या निम्नस्तरीय योगदान (जहां तक उन्हें अवसर मिला या दिया गया) नहीं दिया है। भला इस बात से देश की एकता-अखण्डता का क्या संबंध कि एक समुदाय अपने दाम्पत्य या निजी पारिवारिक मआमले दूसरों से भिन्न शैली में अपनाता और चलाता है।
एकता तो उस समय प्रभावित होगी और अखण्डता को ख़तरा उस समय पेश आ सकता है जब विभिन्न समुदायों को मजबूर किया जाए कि वह अपने धार्मिक नियमों और मान्यताओं, तथा व्यक्तिगत व पारिवारिक क्षेत्र की परम्पराओं को छोड़ दें। फिर तो मुसलमानों तक ही बात सीमित नहीं रह पाएगी, या अन्य अल्पसंख्यकों तक; बल्कि ख़ुद वह समाज जिसे बहुसंख्यक (=हिन्दू) समाज कहा जाता है, और जिसमें नस्ल, वर्ण, जाति, उपजाति, उप-उपजाति पर आधारित सैकड़ों उप-समुदाय हैं, आपस में ही उलझ कर, अशांति व संघर्ष तथा अन्तर्विरोध का शिकार होकर रह जाएगा। यही कारण है कि समान नागरिक संहिता का मुद्दा रह-रहकर उठाने वाले लोग भी यह बात मानते, स्वीकार करते और कहते हैं कि हमारे देश में कोई समान नागरिक संहिता संभव एवं व्यावहारणीय है ही नहीं।
3. मुसलमानों का आग्रह
मुस्लिम पर्सनल लॉ पर मुसलमानों के आग्रह के कारण मुख्यतः दो हैं, एक: ये (निकाह, तलाक़ आदि) के क़ानून उनके अपने बनाए हुए नहीं, ईश्वर द्वारा बनाए गए हैं। शरीअ़त (इस्लामी विधान) की मौलिक रूप-रेखा अल्लाह की बनाई हुई, तथा इसकी व्याख्या भी अल्लाह के, या विस्तार में जाने पर अल्लाह के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के द्वारा तय की गई है। किसी मुसलमान धर्म-विद् को, या दुनिया के सारे मुसलमान मिल जाएं तो उन्हें भी, उस मौलिक रूप रेखा में, उसकी पैग़म्बरीय व्याख्या में परिवर्तन, कमी-बेशी का अधिकार प्राप्त नहीं है (समयानुसार, या आवश्यकतानुसार) उन क़ानूनों की विवेचना और लागूकरण (Interpretation and Application) सिर्फ़ उतनी ही, उसी सीमा के अंतर्गत की जा सकती है जो मौलिक-स्तर पर अल्लाह और उसके पैग़म्बर ने निर्धारित कर दी है। उस मात्रा की अवहेलना तथा उस सीमा का उल्लंघन करते ही, इस्लाम का तिरस्कार हो जाएगा, मुस्लिम समुदाय इस्लाम की परिधि से बाहर निकल जाएगा। इस्लाम की वास्तविकता, तथा इस्लाम और मुसलमानों के बीच संबंध, और मुसलमानों के जीवन के कुछ विशेष क्षेत्रों में इस्लामी शरीअत की इस भूमिका से भली-भांति अवगत (Informed) न होने के कारण ही, हमारे देशबंधुओं को यह उलझन कभी-कभी सताया करती है कि आख़िर मुस्लिम समुदाय अपने लिए अलग पर्सनल लॉ पर इतना घोर आग्रह (‘ज़िद’?) और समान नागरिक संहिता (Common Civil Code) का विरोध क्यों करता है। दो: किसी भी बुद्धिमान भारतीय नागरिक की तरह मुसलमानों को भी यह यक़ीन है कि मुस्लिम समुदाय के ‘पर्सनल लॉज़’ से न तो पृथकतावाद का कोई संबंध है, न ही इससे देश की एकता व अखण्डता को ख़तरा होने की शंका में कोई लेशमात्र भी सच्चाई है (बल्कि सच यह है कि इस मुद्दे को, मात्र राजनीतिक हित (वोटों के ध्रुवीकरण) के लिए कुछ-कुछ वर्षों बाद छेड़ दिया जाता है; इसे छेड़ने वाले लोग भी ‘समान नागरिक संहिता’ की व्यावहारिकता के इन्कारी हैं)।
 


मुख पृष्ठ   |   किताबें   |   सीडी   |   वीडियो   |   हमसे संपर्क करें
Copyright © 2017 www.islamdharma.org