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‘कअ़बा’: ‘मूर्तिपूजा’ का प्रतीक?
   

‘कअ़बा’: ‘मूर्तिपूजा’ का प्रतीक?

इस्लाम स्वयं को मूर्तिपूजा का विरोधी धर्म कहता है लेकिन मुसलमान नमाज़ पढ़ते समय कअ़बा की ओर मुंह कर लेते हैं। हज में, कअ़बा में लगे काले पत्थर की भी पूजा करते हैं। यह मूर्ति-पूजा नहीं तो और क्या है? मूर्ति-पूजक लोग भी तो मूर्तियों को सामने रखकर, वास्तव में ईश्वर की ही उपासना करते हैं।
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ईश-पूजा—विशुद्ध एकेश्वरवाद
भारतीय धर्म-परंपरा में कोई ‘ईश्वर का मन्दिर’ नहीं होता जिसमें ईश्वर की पूजा उपासना की जाती हो। यहां देवताओं, देवियों और अवतारों के नाम से स्थापित मन्दिर हैं जिन में उनकी मूर्तियों को सामने रखकर उनकी पूजा की जाती है।
इस्लाम की विशुद्ध एकेश्वरवादी अवधारणा में सिर्फ़ ईश्वर की पूजा होती है; उस ईश्वर का न तो कोई अवतार होता है, न ही कोई देवी/देवता-स्वरूप। यहां मस्जिद के उपासना-गृह में निराकार ईश्वर को ही पूजा उपासना होती है। कअ़बा की ओर केवल रुख़ किया जाता है ताकि पूरे विश्व में, मुसलमानों में नमाज़ पढ़ने के बारे में मुख-दिशा-निर्धारण में एकाग्रता व एकसमानता (Uniformity) स्थाई रूप से निश्चित रहे। कअ़बा की हैसियत इससे ज़्यादा कुछ नहीं है। वह किसी देवी-देवता या अवतार का, न मूर्ति-स्वरूप है, न ईश्वर का प्रतिनिधित्व करता है। अपने अस्तित्व में वह पत्थरों का एक चैकोर ढांचा है जिसमें दीवारें हैं, छत है, दरवाज़ा है।
कअ़बा के ढांचे के एक कोने पर एक काला पत्थर लगाया हुआ है। इस पत्थर को इस्लाम के पैग़म्बर ने चूमा था (इसकी पूजा नहीं की थी)। चूमने की इस क्रिया में कोई ईश-भावना न थी। अतः पैग़म्बर साहब के अनुकरण में आपके अनुयायी भी इसे चूमने लगे और यह क्रम आज तक जारी है। उस समय किसी के हृदय व मस्तिष्क में यह विचार (या शंका) लेशमात्र भी न था कि इस पत्थर में कोई ईश्वरीय गुण या शक्ति है और यह कोई लाभ या हानि पहुंचा सकता है अतः पूजा रूप में इसे चूमा जाए।
पैग़म्बर साहब के दो वर्ष बाद, आपके तीसरे उत्तराधिकारी (ख़लीफ़ा) हज़रत उमर (रज़ि॰) के शासनकाल (634-645 ई॰) में आप (रज़ि॰) ने इस ख़्याल से कि कहीं आगे चलकर लोग अज्ञानतावश या भावुक होकर इस काले पत्थर को, पत्थर से ‘कुछ अधिक’ न समझने लगें; एक अवसर पर जनता के बीच, पत्थर के सामने खड़े होकर कहा: ‘‘तू एक पत्थर है, सिर्फ़ पत्थर; हम तुझे बस इस वजह से चूमते हैं कि हमने पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) को तुझे चूमते हुए देखा था। इससे ज़्यादा तेरी कोई हैसियत, कोई महत्व हमारे निकट नहीं है। हमारा विश्वास है कि तू एक निर्जीव वस्तु, हमें न कोई फ़ायदा पहुंचा सकता है, न नुक़्सान’’ (पूज्य व उपास्य होना तो दूर की बात, असंभव बात है)।
कअ़बा और ‘काला पत्थर’ का इतिहास
प्रश्न उठता है कि फिर कअ़बा और काला पत्थर है क्या? उत्तर के लिए संक्षेप में इनके इतिहास पर दृष्टि डालनी चाहिए। लगभग 4000 वर्ष पूर्व अल्लाह ने पैग़म्बर इब्राहीम (अलैहि॰) को आदेश दिया कि इस स्थान पर एक ढांचा बनाओ। उन्होंने अपने बेटे इस्माईल (अलैहि॰) के साथ मिलकर पत्थरों का ढांचा बना लिया। ईश्वर ने इसे ‘अपना घर’ (बैत्-उल्-लाह) कहा और आदेश दिया कि यहां मेरे उपासना-स्वरूप नमाज़ पढ़ो और इसकी परिक्रमा (तवाफ़) करो। इसे एकेश्वरवाद का प्रतीक क़रार दिया गया। यहां यह बात स्पष्ट रहे कि यह कअ़बा का ढांचा ‘ईश्वर का प्रतीक’ नहीं था कि इसकी ओर मुख करके नमाज़ पढ़ना या इसकी परिक्रमा करना ‘कअ़बा की पूजा’ माना जाता, बल्कि यह ‘एकेश्वरवाद का प्रतीक’ था; उस समय के, उसके बाद के और हमेशा के मुसलमानों को एकेश्वरवाद के इस केन्द्र से जोड़कर उन्हें एकेश्वरवाद पर एकाग्र, एकत्र व संगठित करने के लिए; तथा इसकी परिक्रमा इस बात की द्योतक व प्रतीक थी कि मुस्लिमों का व्यक्तिगत व सामूहिक जीवन एकेश्वरवाद की धुरी पर इसी के चारों ओर घूमेगा, यानी व्यवस्थित व संगठित रहेगा।
लगभग ढाई हज़ार वर्ष तक यह क्रम चलता रहा, लेकिन अज्ञानता के अंधेरे आए तो इस कअ़बा में मूर्तियां रख दी गईं और एकेश्वरवाद का केन्द्र अनेकेश्वरवाद का केन्द्र बन गया। पैग़म्बर मुहम्मद साहब ने अपनी पैग़म्बरी के लगभग 21वें वर्ष इसे मूर्तियों से पाक, रहित कर दिया और इसकी ‘एकेश्वरवाद का केन्द्र’ होने की हैसियत को बहाल (Restore) कर दिया। यह स्थिति डेढ़ हज़ार वर्ष से क़ायम है। नगर मक्का में, विश्व भर के मुसलमान आम दिनों में प्रतिदिन और विशेषकर हज के दिनों में विशेष आयोजन के साथ इस कअ़बा की परिक्रमा करते, इसकी दिशा में मुख करके ईश्वर अल्लाह की उपासना (नमाज़ अदा) करते हैं। इसके साथ ही, वे विश्व में कहीं भी हों, इसी कअ़बा की ओर रुख़ करके ही नमाज़ पढ़ते हैं, इसी के अनुकूल दुनिया भर में हर जगह हर मस्जिद का निर्धारित दिशानुसार निर्माण होता है।
इतिहास के किसी चरण में मक्का के निवासियों को नगर के आसपास कहीं एक काला चमकदार पत्थर मिला। ऐसे पत्थर उस पहाड़ी क्षेत्र के पहाड़ों में कहीं भी नहीं पाए जाते थे। उन्होंने समझा कि यह स्वर्ग लोक से नीचे आया है। (संभवतः यह किसी उल्कापिण्ड (Meteorite) का टुकड़ा रहा होगा)। लोगों ने उसे धन्य और पवित्र समझ कर कअ़बा के एक कोने पर लगा दिया और चूमने लगे। उस समय से, पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल॰) के समय तक उन मूर्तिपूजकों और अनेकेश्वरवादियों ने भी उस पत्थर की पूजा कभी नहीं की।
इस्लाम का आह्वान करने के साथ मूर्तिपूजा तथा अनेकेश्वरवाद (शिर्क, अर्थात् ईश्वर के साथ किसी को साझी, शरीक, समकक्ष बनाने) का खंडन किया जाने लगा। काले पत्थर को पूजने की परम्परा नहीं थी, लोग इसे केवल चूमते ही रहे थे इसलिए पैग़म्बर साहब ने लोगों की भावनाओं को अकारण छेड़ना उचित, लाभदायक व अनिवार्य न समझा बल्कि परम्परागत आप (सल्ल॰) भी उसे चूम लिया करते। आप ही के अनुसरण में मुसलमान उस काले पत्थर (हजर-ए-असवद) को डेढ़ हज़ार वर्ष से आज तक चूमते आ रहे हैं; इस धारणा और विश्वास के साथ कि ‘‘यह मात्र एक पत्थर है, इसमें कोई ईश्वरीय गुण या शक्ति नहीं; यह किसी को न कुछ फ़ायदा पहुंचा सकता है न नुकसान।’’
 


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