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हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) : प्रसिद्धतम व्यक्तित्व
   

हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) : प्रसिद्धतम व्यक्तित्व

‘‘यदि उद्देश्य की महानता, साधनों का अभाव और शानदार परिणाम—मानवीय बुद्धिमत्ता और विवेक की तीन कसौटियाँ हैं, तो आधुनिक इतिहास में हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) के मुक़ाबले में कौन आ सकेगा? विश्व के महानतम एवं प्रसिद्धतम व्यक्तियों ने शस्त्रास्त्र, क़ानून और शासन के मैदान में कारनामे अंजाम दिए। उन्होंने भौतिक शक्तियों को जन्म दिया, जो प्रायः उनकी आँखों के सामने ही बिखर गईं। लेकिन हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) ने न केवल फ़ौज, क़ानून, शासन और राज्य को अस्तित्व प्रदान किया, बल्कि तत्कालीन विश्व की एक तिहाई जनसंख्या के मन को भी छू लिया। साथ ही, आप (सल्ल॰) ने कर्मकांडों, वादों, धर्मों, पंथों, विचारों, आस्थाओं इत्यादि में बहुमूल्य परिवर्तन कर दिया।
इस एकमात्र पुस्तक (पवित्र क़ुरआन) ने, जिसका एक-एक अक्षर क़ानूनी हैसियत प्राप्त कर चुका है, हर भाषा, रंग, नस्ल और प्रजाति के लोगों को देखते-देखते एकीकृत का दिया, जिससे एक अभूतपूर्व अखिल-विश्व आध्यात्मिक नागरिकता का निर्माण हुआ। हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) द्वारा एकेश्वरवाद की चामत्कारिक घोषणा के साथ ही विभिन्न काल्पनिक तथा मनगढ़ंत आस्थाओं, मतों, पंथों, धार्मिक मान्यताओं, अंधविश्वासों एवं रीति-रिवाजों की जड़ें कट गईं।
उनकी अनन्त उपासनाएँ, ईश्वर से उनकी आध्यात्मिक वार्ताएँ, लौकिक और पारलौकिक जीवन की सफलता—ये चीज़ें न केवल हर प्रकार के पाखंडों का खंडन करती हैं, बल्कि लोगों के अन्दर एक दृढ़ विश्वास भी पैदा करती हैं, उन्हें एक शाश्वत धार्मिक सिद्धांत क़ायम करने की शक्ति भी प्रदान करती हैं। यह सिद्धांत द्विपक्षीय है। एक पक्ष है ‘एकेश्वरवाद’ का और दूसरा है ‘ईश्वर के निराकार’ होने का। पहला पक्ष बताता है कि ‘ईश्वर क्या है?’ और दूसरा पक्ष बताता है कि ‘ईश्वर क्या नहीं है?’
दार्शनिक, वक्ता, धम्रप्रचारक, विधि-निर्माता, योद्धा, विचारों को जीतने वाला, युक्तिसंगत आस्थाओं के पुनरोद्धारक, निराकार (बिना किसी प्रतिमा) की उपासना, बीस बड़े राष्ट्रों और एक आध्यात्मिक सत्ता के निर्माता एवं प्रतिष्ठता वही हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) हैं, जिनके द्वारा स्थापित मानदंडों से मानव-चरित्रा की ऊँचाई और महानता को मापा जा सकता है। यहाँ हम यह पूछ सकते हैं कि क्या हज़रत मुहम्मद (सल्ल॰) से बढ़कर भी कोई महामानव है?’’
(लेमराइटन, हिस्टोरी डी ला तुर्की, पेरिस, 1854, भाग-2, पृ॰ 276-277)
 


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